सुना है इश्क़ भी रब की इबादत से कम नहीं है।

तू एक खुशबू है उपवन का, जुदा कोई कर नहीं सकता,
तू है एक ख्वाब आँखो का फना कोई कर नहीं सकता।
जतन कर ले कोई कितना जमाने मे जुदाई का,
तेरे मेरे मोहब्बत को वो रुसवा कर नहीं सकता।
है मेरे रूह भी बंदी जेहन मे तू भी है अब भी,
वजह अब जो भी हो साथी, लूटा हूं जीत कर सभी,
नहीं कुछ पास अब मेरे नहीं कुछ डर जमाने का,
चले है इस कदर की मंजिल से नुमाया कर नहीं सकते।
कश्मकश है कि मंजिल तू है या खुद खुदा मेरे,
फना हो आरजू की रब मे या की इश्क़ मे तेरे,
सुना है इश्क़ भी रब की इबादत से कम नहीं है तो,
सनम और रब को हम खुद से पराया कर नहीं सकते।
                                                ~ शिशिर प्रियदर्शी
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ऐसा तो बस माँ ही हो सकती है।

सृष्टि की जननी है वो, वो प्रकृति का सौंदर्य है
वह ब्रह्मा का स्वरुप है, वो विष्णु का गर्व है
सरस्वती का रूप है तो दुर्गा का भी शौर्य है
तू आदि है, तू अंत है, तू सृष्टि का ऐश्वर्य है।

माँ प्रेम है, माँ चैन है, माँ प्रेम का प्रतीक है
माँ चाह है, माँ राह है, माँ लोरी का संगीत है
माँ स्नेह है, वात्सल्य है, माँ हर हार मे भी जीत है
माँ माँ माँ तू सर्वस्व है मेरा तू आत्मा का गीत है।

तू जननी है तू सबला है, तू संजीवनी है
तू पिता का संबल, तू शिशु का आसमान है,
तू पत्नी है, तू बहू है, तू ही परिवार की धूरी है
जीवन के हर रूप को महकाए वो कस्तुरी है।

कुछ भी कहूँ तेरे लिए कम ही जान पड़ता है
ऐ माँ तुझसे ही दुनिया जहान लगता है।
ठोकर खा के भी जो प्रेम दे जीवन दे
ऐसा चरित्र तो बस माँ का ही हो सकता है।

                                         ~ साहिल

 

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