क्या बात है?

किताब के पन्नें पलट कर सोचता हूँ,
यूँ पलट जाती जिंदगी तो क्या बात है?
रात कटती नही दिन बहलता नही,
यूँ जो ख़ुशियाँ से भर जाए तो क्या बात है?

मिट्टी से बने और मिल गये मिट्टी में
यूँ पल भर में जी लेते जिंदगी तो क्या बात है?
ढूँढते थे जिन्हें दर-बदर
वो यूँहि एक मोड़ पर मिल जाते, तो क्या बात है?

सब कुछ पाया एक तेरे सिवाय,
यूँहि मिल जाते हमें तो क्या बात है?
तस्वीरों से बातें की, फिर दिल को समझाया,
ख़्वाबों से निकल आते, तो क्या बात है?

किताब के पन्नें पलट कर सोचता हूँ,
यूँ पलट जाती जिंदगी तो क्या बात है?
रास्ते कठिन है, चलना है दूर तलक
यूँहि संग चलते चलते, कट जाती जिंदगी तो क्या बात है?

                          ~ सुब्रत सौरभ 

मुझे देखती है जिंदगी कुछ इस तरह से

मेरी किताब “कुछ वो पल” का एक अंश।

 

मुझे देखती है जिंदगी कुछ इस तरह से,

और पूछती है बड़ी अदब से,

की बता तेरी अब ख़्वाहिश क्या है?

 

हम भी बड़े इत्मीनान से,

थोड़ा मुस्कुरा के मोहब्बत में,

नजरें झुकाए तेरा नाम लेते।

 

फिर थोड़ा मुस्कुरा के और जरा अदब से,

वो पूछती है नजरे झुकाए,

की बता तेरी मंजिल कहाँ है?

 

हम भी बड़े फक्र से और बड़ी बेफिक्री से,

उस रास्ते को जहाँ तेरा घर है,

बड़े शान से ईशारा करते है।

 

फिर संकोच करते हुए और एक मायूसी से,

उसने पूछा चिड़चिड़ा के,

की बता तेरी पहचान क्या है?

 

सोचा हमने कई पहर, बेरोजगारी के आलम में,

एक जवाब की तलाश में, इस उलझन से निकलने के लिए

फिर कहाँ – “कहना उसे”,

हमें वो भूल जाए, की अब हम चलते है।

                                      ~ सुब्रत सौरभ