मुझे देखती है जिंदगी कुछ इस तरह से

मेरी किताब “कुछ वो पल” का एक अंश।

 

मुझे देखती है जिंदगी कुछ इस तरह से,

और पूछती है बड़ी अदब से,

की बता तेरी अब ख़्वाहिश क्या है?

 

हम भी बड़े इत्मीनान से,

थोड़ा मुस्कुरा के मोहब्बत में,

नजरें झुकाए तेरा नाम लेते।

 

फिर थोड़ा मुस्कुरा के और जरा अदब से,

वो पूछती है नजरे झुकाए,

की बता तेरी मंजिल कहाँ है?

 

हम भी बड़े फक्र से और बड़ी बेफिक्री से,

उस रास्ते को जहाँ तेरा घर है,

बड़े शान से ईशारा करते है।

 

फिर संकोच करते हुए और एक मायूसी से,

उसने पूछा चिड़चिड़ा के,

की बता तेरी पहचान क्या है?

 

सोचा हमने कई पहर, बेरोजगारी के आलम में,

एक जवाब की तलाश में, इस उलझन से निकलने के लिए

फिर कहाँ – “कहना उसे”,

हमें वो भूल जाए, की अब हम चलते है।

                                      ~ सुब्रत सौरभ

6 thoughts on “मुझे देखती है जिंदगी कुछ इस तरह से

    1. शुक्रिया 😊 अगर हो सके तो मेरी किताब “कुछ वो पल” पढ़े। ये Amazon पर उपलब्ध है।

    1. शुक्रिया 😊 अगर हो सके तो मेरी किताब “कुछ वो पल” पढ़े। ये Amazon पर उपलब्ध है।

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